Agra : शुद्ध गीता: अंधश्रद्धा से तर्क और विज्ञान की ओर, डॉ. सतीश चंद्र शर्मा का वैदिक पुनर्जागरण का संदेश
आर्य समाज जयपुर हाउस में शुद्ध गीता के लेखक डॉ सतीश चंद्र शर्मा का भव्य सम्मान, गीता के मौलिक स्वरूप पर हुआ विचार-मंथन

मनोहर समाचार, आगरा। श्रीमद् भगवद् गीता को उसके शुद्ध, मौलिक और वैदिक स्वरूप में जनमानस तक पहुँचाने के उद्देश्य से रचित शुद्ध गीता के लेखक, सुप्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ एवं वैदिक चिंतक डॉ. सतीश चंद्र शर्मा (एमबीबीएस, एमएस, एमसीएच) के आगरा आगमन पर आर्य समाज जयपुर हाउस में सम्मान समारोह एवं विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर डॉ. सतीश चंद्र शर्मा को शुद्ध गीता जैसे मौलिक, शोधपरक एवं समाज-जागरणकारी ग्रंथ के सृजन तथा वैदिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार हेतु स्वामी विश्वानंद सरस्वती (अध्यक्ष, अधिष्ठाता, महर्षि दयानंद आर्ष संस्थान, आर्ष गुरुकुल एवं श्रीकृष्ण गौशाला, विजयनगर दखोला, मथुरा), डॉ. वीरेंद्र खंडेलवाल, विपिन बिहारी, हरिशंकर अग्निहोत्री, डॉ. प्रेम पाल शास्त्री, गजेंद्र शर्मा तथा आर्य समाज जयपुर हाउस के प्रधान अश्विनी डेंबला द्वारा सम्मानित किया गया।
700 नहीं, केवल 362 हैं गीता के शुद्ध श्लोक: डॉ. शर्मा
अपने व्याख्यान में डॉ. सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि प्रचलित श्रीमद् भगवद् गीता में माने जाने वाले 700 श्लोक ऐतिहासिक, भाषाई एवं वैदिक कसौटियों पर खरे नहीं उतरते। शुद्ध गीता में शोध एवं प्रमाणों के आधार पर केवल 362 शुद्ध श्लोकों को स्वीकार किया गया है, जो वास्तव में गीता का मौलिक स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।
उन्होंने बताया कि मेडिकल साइंस के अध्ययन के दौरान उनके भीतर आध्यात्मिक चेतना का बीज पड़ा। महर्षि दयानंद सरस्वती की सत्यार्थ प्रकाश ने उन्हें वैदिक दर्शन को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने की दिशा दी। इसके पश्चात उन्होंने वर्षों तक वेद, वेदांग, उपनिषद्, स्मृति और श्रुति ग्रंथों का गहन अध्ययन विद्वानों के सानिध्य में किया।
गीता 18 अध्याय नहीं, 18 संवाद हैं
डॉ. शर्मा ने स्पष्ट किया कि श्रीमद् भगवद् गीता मूलतः 18 अध्यायों में नहीं, बल्कि 18 संवादों में विभाजित है। यदि 362 श्लोकों के उच्चारण-समय का आकलन किया जाए, तो यह ज्ञान एक से डेढ़ घंटे में अर्जुन को दिया गया होगा, न कि 18 दिनों में। यह तथ्य भी गीता के वर्तमान स्वरूप पर पुनर्विचार की आवश्यकता को दर्शाता है।
श्रीकृष्ण के चरित्र से जुड़ी भ्रांतियों का सप्रमाण निवारण
उन्होंने कहा कि शुद्ध गीता में भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र पर लगाए गए मिथ्या आरोपों और ऐतिहासिक भ्रांतियों का तर्क एवं प्रमाणों के साथ समाधान प्रस्तुत किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने कभी आत्म-प्रशंसा नहीं की और न ही स्वयं को ईश्वर घोषित किया, बल्कि अर्जुन को ईश्वर की शरण में जाने का संदेश दिया।
अंधविश्वास ही गुलामी का कारण
डॉ. शर्मा ने कहा कि भारत भूमि की हजारों वर्षों की गुलामी का मूल कारण हमारा स्वयं का अंधविश्वास रहा है। वेद भारतीय संस्कृति के परिचायक हैं और वेद ही अंतिम प्रमाण हैं। शास्त्रों में हुई मिलावटों के कारण समाज भ्रमित हुआ। त्रुटियुक्त ज्ञान समाज के लिए विष के समान होता है, इसलिए शुद्ध गीता में विवेचना पूरी तरह तर्क, विज्ञान और वैदिक सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने बताया कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भी लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व महाभारत ग्रंथ में छेड़छाड़ की बात कही थी। शुद्ध गीता लगभग 620 पृष्ठों का ग्रंथ है, जिसके लेखन का कार्य 2017 में प्रारंभ हुआ, जबकि इससे पूर्व लगभग 10 वर्षों तक शोध किया गया। ग्रंथ में 338 ऐसे श्लोक भी सम्मिलित हैं, जिन्हें त्रुटियुक्त मानते हुए पृथक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
वैदिक विद्वान और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सर्जन हैं डॉ सतीश चंद्र शर्मा
डॉ. सतीश चंद्र शर्मा विगत 41 वर्षों से देश-विदेश के प्रतिष्ठित अस्पतालों में हृदय, वक्ष एवं वाहिका शल्य चिकित्सक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने एमबीबीएस एवं एमएस सर्जरी एस.एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा से तथा एमसीएच कार्डियोथोरेसिक सर्जरी पीजीआई, चंडीगढ़ से पूर्ण की। वे अमेरिका के पोर्टलैंड स्थित सेंट विंसेंट हॉस्पिटल में विजिटिंग प्रोफेसर रह चुके हैं और विश्वविख्यात सर्जन डॉ. अल्बर्ट स्टार के सानिध्य में कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में वे विश्व वेद विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के अध्यक्ष हैं।
कार्यक्रम के समापन पर कोमिला धर द्वारा लेखक का परिचय प्रस्तुत किया गया। संचालन पंडित हरिशंकर अग्निहोत्री ने किया और व्यवस्था रमाकांत सारस्वत ने संभाली। इस अवसर पर डॉ. कैलाश चंद सारस्वत, कांग्रेस जिलाध्यक्ष अमित सिंह, डॉ. अनुपम गुप्ता, अरविंद मेहता, वेदपाल धार, त्रिवेणी आनंद, नमिता शर्मा, विजय अग्रवाल, सुधाकर गुप्ता आदि उपस्थित रहे।




