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Agra : कुछ भी हो सकता है” में अनुपम खेर ने सुनाया संघर्ष, सफलता और जिंदगी का सफर

मनोहर समाचार, आगरा। अभिनेता अनुपम खेर ने अपने बहुचर्चित एकल नाट्य शो “कुछ भी हो सकता है” के माध्यम से आगरा के दर्शकों को भावनाओं, हास्य, संघर्ष और प्रेरणा से भर दिया। स्पाइसी शुगर संस्था द्वारा सूरसदन प्रेक्षागृह में आयोजित इस विशेष प्रस्तुति में शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और कला प्रेमियों की भारी उपस्थिति रही। कार्यक्रम का स्वागत संस्था की संस्थापक पूनम सचदेवा ने किया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक प्ले नहीं, बल्कि जिंदगी को देखने का नजरिया है। डॉ. रंजना बंसल ने सभी अतिथियों का स्वागत किया। संचालन पावनी और चांदनी ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत बेहद अनोखे अंदाज में हुई। जैसे ही प्रेक्षागृह की लाइट बंद हुई, अभिनेता अनुपम खेर अचानक साइड गेट से बेहद सामान्य अंदाज में दर्शकों के बीच पहुंचे। आते ही उन्होंने अपने चिर-परिचित हास्य शैली में कहा, “आगरा के सारे गुड लुकिंग लोग आ गए।” उनके इस संवाद पर पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। बीच-बीच में दर्शकों से सहज संवाद, हास्य प्रसंग और जीवन के अनुभवों ने पूरे शो को जीवंत बनाए रखा।

अनुपम खेर ने बताया कि 21 वर्ष पूर्व शुरू हुए इस शो का आगरा में 501वां मंचन हुआ और संयोग से 25 मई को ही उनके फिल्मी करियर के 42 वर्ष भी पूरे हुए। उन्होंने अपने बचपन, स्कूल जीवन, पहली गर्लफ्रेंड, पहले प्यार और संघर्षों को बेहद सहज और भावुक अंदाज में साझा किया। उन्होंने बताया कि अभिनय सीखने के लिए जब पहली बार चंडीगढ़ के एक्टिंग स्कूल पहुंचे तो महिला पात्र की एक्टिंग कर दाखिला पाया। मां के मंदिर से 100 रुपये चुराकर घर से निकलने का किस्सा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि वही साहस उन्हें आगे बढ़ाता गया।

उन्होंने बताया कि 27 जुलाई 1974 को शिमला छोड़कर थिएटर सीखने निकल पड़े। शुरुआत में उन्हें कहा गया कि उन्हें स्टेज पर चलना तक नहीं आता, लेकिन लगातार मेहनत से वही छात्र बाद में गोल्ड मेडल लेकर निकला। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में बिताए संघर्षपूर्ण दिनों, थिएटर जीवन और अभिनय के प्रति समर्पण का भी उन्होंने विस्तार से उल्लेख किया।

उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया कि 3 जून 1981 को गर्लफ्रेंड के प्रोत्साहन से मुंबई पहुंचे, लेकिन महीनों तक संघर्ष करना पड़ा। फिल्म “गांधी” में नेहरू का रोल मिला, लेकिन बाद में किसी और को दे दिया गया। आर्थिक तंगी, असफलताएं और टूटे रिश्तों के बीच वह दोबारा मुंबई लौटे। उन्होंने बताया कि फिल्म “सारांश” के लिए उन्हें 28 वर्ष की उम्र में 65 वर्षीय वृद्ध का किरदार मिला। इस भूमिका के लिए उन्होंने सिर तक मुंडवा लिया और छह महीने तक लगातार तैयारी की। यही फिल्म उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी।

अनुपम खेर ने अपने करियर के उतार-चढ़ावों का जिक्र करते हुए बताया कि सफलता मिलने के बाद उन्होंने एक सप्ताह में 57 फिल्में साइन कर ली थीं। घमंड भी आया, लेकिन अभिताभ बच्चन की सहजता ने उन्हें फिर जमीन से जोड़ दिया। दिलीप कुमार, संजीव कुमार, सतीश कौशिक, मुकुल आनंद, मनमोहन देसाई और अपने दादाजी को उन्होंने भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।

उन्होंने बताया कि लगातार काम करने से उनका चेहरा तक प्रभावित हो गया था और दो महीने इलाज चला। इसके बाद विशेष बच्चों के साथ काम करने का अनुभव उनके जीवन का सबसे सकारात्मक अध्याय बना। उन्होंने हर बुधवार उन बच्चों के स्कूल जाना शुरू किया, जहां बच्चों की मुस्कान ने उन्हें नई ऊर्जा दी।

अपने प्रोडक्शन हाउस, कर्ज, असफलताओं और चेक बाउंस होने जैसी कठिन परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिंदगी में ऐसे दौर भी आए जब सारे रास्ते बंद नजर आए, लेकिन समय हमेशा बदलता है। बाद में निर्देशन, अभिनय और नए प्रोजेक्ट्स के जरिए उन्होंने खुद को फिर स्थापित किया।

पूरे शो के दौरान उन्होंने बार-बार यही संदेश दिया कि “लाइफ में कुछ भी हो सकता है।” उन्होंने कहा कि यदि एक लंगोटी वाला आदमी देश को आजादी दिला सकता है, तो कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को साकार कर सकता है।

कार्यक्रम में डीआईजी शैलेश पांडे, वाई के गुप्ता, मधु बघेल, शलभ गुप्ता सहित शहर की अनेक प्रमुख हस्तियां उपस्थित रहीं।

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