Agra : स्पाइन एवं ब्रेन स्ट्रोक के आधुनिक एवं प्रभावी उपचार के लिए नवीनतम तकनीक ज्ञान और अनुभव को विशेषज्ञों ने किया साझा
आधुनिक तकनीकों और नवीन अनुसंधानों द्वारा रीढ़ और मस्तिष्क संबंधी जटिल रोगों के मरीजों को सर्वोत्तम उपचार प्रदान करना हमारा प्रमुख लक्ष्य: डॉ. अरविंद अग्रवाल

मनोहर समाचार, आगरा। वर्तमान समय में बदलती जीवन शैली, तनाव, अनियमित खानपान, मधुमेह, उच्च रक्तचाप एवं अन्य कारणों से स्ट्रोक, स्पाइन रोग एवं न्यूरोलॉजिकल बीमारियों की घटनाओं में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है। इन जटिल बीमारियों के आधुनिक एवं प्रभावी उपचार हेतु विशेषज्ञों के बीच नवीनतम वैज्ञानिक जानकारी का आदान प्रदान करने के उद्देश्य से यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी एवं न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी, आगरा द्वारा रविवार को होटल जेपी पैलेस में ‘भविष्य की ओर अग्रसर’ थीम पर मिड टर्म सीएमई- 2026 का भव्य आयोजन किया गया।

इस बेहद महत्वपूर्ण सेमिनार में आगरा, बरेली, मुरादाबाद, अलीगढ़, मथुरा, नोएडा, झाँसी, सैंफई, लखनऊ, प्रयागराज, फरीदाबाद, गाजियाबाद और दिल्ली सहित देश भर से पधारे 130 से अधिक प्रतिष्ठित न्यूरोसर्जन, न्यूरोलॉजिस्ट एवं स्पाइन विशेषज्ञों का हार्दिक स्वागत करते हुए आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल ने स्वागत भाषण में कहा कि न्यूरोसर्जरी में सूक्ष्मता, धैर्य और सटीकता ही सफल परिणाम की कुंजी है। हमारा प्रयास है कि आधुनिक तकनीकों और नवीन अनुसंधानों के माध्यम से मरीजों को सुरक्षित और बेहतर उपचार उपलब्ध कराया जा सके।

सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक निरंतर चलने वाले विभिन्न वैज्ञानिक सत्रों में ब्रेन स्ट्रोक (लकवा) और रीढ़ की हड्डी से संबंधित विभिन्न बीमारियों के निदान के लिए लेटेस्ट दवाइयों और सर्जिकल तकनीक पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान के साथ पैनल चर्चा की गई।

मुख्य अतिथि जाने माने न्यूरो सर्जन डॉ. आरसी मिश्रा, यूपी-यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल, सचिव डॉ. अरविंद कनकने, आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल, सचिव डॉ. विनय अग्रवाल, सदस्य डॉ. आलोक अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता और डॉ. मयंक अग्रवाल ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर सेमिनार का शुभारंभ किया।

बदलिए अपना आहार और व्यवहार, अन्यथा बन सकते हैं पक्षाघात का शिकार: डॉ. पीके माहेश्वरी
एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष डॉ. पीके माहेश्वरी ने बायोलॉजिकल क्लॉक और ब्रेन अटैक के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि देर से सोना, देर से उठना, सूर्यास्त के बाद देर रात भोजन करना, पैदल न चलना, शारीरिक श्रम न करना आदि खराब आदतों के कारण ज्यादातर लोगों की जैविक घड़ी खराब हो गई है। इसी कारण वह अनिद्रा, तनाव, अवसाद, बीपी और स्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जो लोग देर रात तक जागते या काम करते हैं उनमें नींद प्रदान करने वाला मेलाटोनिन हार्मोन कम हो जाता है। ऐसे लोगों को जब लकवा मारता है तो उसकी रिकवरी भी धीमी होती है। इनमें मृत्यु दर भी ज्यादा होती है। इसलिए जरूरी है कि हम अपना आहार और व्यवहार बदलें..
लकवे के मरीज में शुरू के 3 घंटे इलाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण..
‘स्ट्रोक में थ्रंबोलाइसिस’ विषय पर महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज झाँसी में न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष तथा यूपी- यूके न्यूरोसाइंस सोसाइटी के सचिव डॉ. अरविंद कनकने ने बताया कि लकवे के मरीजों में इंजेक्शन के थ्रू नसों में थ्रंबोलिसिस दवा द्वारा रक्त के थक्के को घोलकर रक्त प्रवाह बहाल किया जाता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं को बचाया जाता है।
उन्होंने बताया कि लक्षण शुरू होने के साढे चार घंटे में इंट्राविनस थ्रंबोलिसिस इंजेक्शन लगवाना चाहिए। यह समय गोल्डन आवर का होता है हालांकि आदर्श रूप से 3 घंटे के भीतरी अगर इंजेक्शन लगवा दिया जाए तो परिणाम और बेहतर आते हैं। समय पर इलाज होने से लकवे के स्थाई प्रभाव और विकलांगता को कम किया जा सकता है।
कैंसर न होते हुए भी कैंसर की तरह व्यवहार करता है यह ट्यूमर
देश दुनिया के जाने-माने न्यूरो सर्जन डॉ. आरसी मिश्रा ने ‘सीएनएस हिमेंजिओब्लास्टोमाज के प्रबंधन’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि यह ऐसा खतरनाक ट्यूमर है जो कैंसर ना होते हुए भी कैंसर की तरह व्यवहार करता है। यह ऐसी जगह पाया जाता है जहाँ से इंसान की साँस चलती है। इसकी स्थिति देखकर सर्जन के भी पसीने छूट जाते हैं। ट्यूमर का आकार, स्थान और वृद्धि दर के साथ रोगी की समग्र स्वास्थ्य स्थिति देखकर सर्जरी या रेडियो सर्जरी द्वारा इसका प्रबंधन किया जाता है।
अब मुँह में चीरा देकर ऑपरेशन नहीं करना पड़ता, खतरा हुआ कम
‘एंडोनेजल एंडोस्कोपिक ओडोन्टोएक्टोमी’ विषय पर संजय गाँधी पीजीआई के विभागाध्यक्ष डॉ. अवधेश कुमार जैसवाल, लखनऊ ने बताया कि खोपड़ी और रीड की हड्डी जहाँ जुड़ती है, वहाँ अक्सर कुछ लोगों की हड्डी खिसक जाती है। ऐसे मरीज के लिए पहले पूरा मुँह खोलकर मुँह में चीरा देकर एक ऑपरेशन किया जाता था जो बहुत रिस्की होता था। इसमें मरीज को बहुत तकलीफ भी होती थी क्योंकि ऑपरेशन मुँह के जरिए किया जाता था। अब जो नई एंडोस्कोपिक तकनीक आई है, उसमें नाक के जरिए एंडोस्कोपी का उपयोग करके छोटा सा चीरा लगाकर दूरबीन द्वारा ऑपरेशन कर दिया जाता है।
सर्वाइकल स्पाइन की सर्जरी के लिए पढ़ा शोध पत्र
आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. अरविंद अग्रवाल ने सर्वाइकल स्पाइन की सर्जरी के क्षेत्र में नवीनतम तकनीकों के बारे में अपनी शोध पत्र को प्रस्तुत करते हुए बताया कि ऑपरेशन की नवीनतम विधियों द्वारा अब हाथ पैर के मारे जाने का खतरा कम हो गया है। मरीज को दर्द से आराम मिलता है। मरीज को शीघ्र ही उठाया बैठाया जा सकता है। गर्दन की हड्डी की स्लिप डिस्क का इलाज भी अब नवीनतम तकनीक से बहुत आसान हो गया है।
रीढ़ की हड्डी में टीबी पर किया गया पैनल डिस्कशन
डॉ. अरविंद कुमार अग्रवाल, डॉ. संजय गुप्ता, डॉ. सुयश सिंह, मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. यशपाल बुंदेला और डॉ. संतोष कुमार के एक पैनल में रीढ़ की हड्डी में टीवी पर विचार विमर्श करते हुए बताया कि यह बीमारी वैसे तो किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है लेकिन युवाओं में ज्यादा देखने में आ रही है। अगर बुखार हो, कमर दर्द हो, चलने में दिक्कत हो, पैरों में झनझनाहट हो, रीढ़ की हड्डी में किसी नस पर ज्यादा दबाव महसूस करें, पैरों में कमजोरी महसूस करें तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। जांच करवाएँ और इलाज शुरू करें। अपना खान-पान अच्छा रखें। अगर कोई व्यक्ति छाती की टीबी का मरीज है तो उससे बात करते समय सावधानी बरतें, मास्क लगाएँ।
ब्रेन स्ट्रोक पर किया गया पैनल डिस्कशन
ब्रेन स्ट्रोक पर किए गए पैनल डिस्कशन में डॉ. विनय अग्रवाल, डॉ. मयंक अग्रवाल, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज लखनऊ के डॉ. बीके ओझा, डॉ. विकास बंसल, मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली के डॉ. विवेक कुमार और डॉ. अंकुर अग्रवाल ने विचार विमर्श करते हुए कहा कि ब्रेन हेमरेज में सबसे मुख्य है रक्तचाप पर नियंत्रण करना। साथ ही जिनको दिल की बीमारी है, उनके ब्रेन स्ट्रोक की रोकथाम में क्लॉट बस्टर की भूमिका महत्वपूर्ण है।
लकवे से बचना है तो ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रखें हृदय रोगी: डॉ. विनय अग्रवाल
डॉ. विनय अग्रवाल ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि हृदय रोगियों में लकवे की घटनाएँ ज्यादा होती हैं। ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने से ब्रेन हेमरेज की बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है।
झाड़ फूँक, मालिश, सुताई और देसी इलाज है नुकसानदायक: डॉ. मयंक अग्रवाल
न्यूरोसर्जन डॉ. मयंक अग्रवाल ने कहा कि आजकल खराब जीवन शैली के कारण लकवा, फालिस, हेमरेज, टीबी और नस दबी होने से परेशान मरीजों के केस बहुत आ रहे हैं। कई बार मरीज किसी विज्ञापन से प्रभावित होकर या किसी के बहकावे में आकर गलत दिशा में इलाज कराते रहते हैं। स्पाइन के पेशेंटस को मालिश करवाना, नसों को सुतवाते रहना, देसी इलाज करना या झाड़ फूंक करवाना गंभीर रूप से नुकसानदायक होता है।
ब्रेन हेमरेज के हर मरीज का ऑपरेशन करके क्लॉट निकाल देना ठीक नहीं..
‘सर्जिकल मैनेजमेंट ऑफ गेंगलीओकैप्सूलर हेमरेज: करंट एविडेंस एंड कंट्रोवर्सीज’ विषय पर अपने विचार साझा करते हुए अपोलो हॉस्पिटल, लखनऊ के विभागाध्यक्ष डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने कहा कि लाइफस्टाइल में परिवर्तन के कारण लोगों में ब्लड प्रेशर की समस्या बढ़ रही है जिसके कारण लोगों ऐसे स्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं जिनसे ब्रेन हेमरेज हो रहा है। ऐसे 100 मरीजों में से 40 मरीज अपना जीवन गँवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विश्व व्यापी शोध से अब ये सिद्ध हो चुका है कि ब्रेन हेमरेज के हर मरीज का ऑपरेशन करके क्लॉट निकाल देना ठीक नहीं है। जब ब्रेन हेमरेज के मरीजों में ब्रेन हेमरेज दिमाग के सरफेस तक आया हुआ होता है तब क्लॉट निकालने का फायदा मिलता है। अन्यथा की स्थिति में ब्रेन हेमरेज के लिए सबसे मुख्य कारक ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाना बेहद आवश्यक है ताकि फिर से ब्रेन हेमरेज होने पर ब्लीडिंग की संभावना न रहे।
एंडोस्कोपिक सर्जरी के रिजल्ट ओपन सर्जरी से बेहतर
डॉ. क्षितिज श्रीवास्तव ने बताया कि ब्रेन हेमरेज के मरीज की सर्जरी में पहले बड़ा सा चीरा लगाकर बड़ी सी हड्डी हटाकर अंदर से क्लॉट निकाला जाता था और इस प्रक्रिया में ब्रेन के अंदर काफी डैमेज होता था लेकिन अब मिनिमल इनवेसिव सर्जरी यानी एंडोस्कोपिक सर्जरी के द्वारा एक छोटे से चीरे से ब्रेन के अंदर से क्लॉट निकाल दिया जाता है। इसके रिजल्ट्स भी बेहतर रहते हैं।
गर्दन की ऊपरी हड्डियों के संतुलन के लिए कारगर है सीवीजे सर्जरी
‘अटलांटोएक्सियल डिस्लोकेशन: क्रैनियोवर्टेब्रल जंक्शन सर्जरी में बदलते परिदृश्य’ विषय पर अपने विचार साझा करते हुए डॉ. अंकुर बजाज, लखनऊ ने कहा कि क्रेनियोवर्टिब्रल जंक्शन यानी गर्दन और दिमाग के जुड़ाव वाले हिस्से की सर्जरी न्यूरोसर्जरी की सबसे जटिल सर्जरी मानी जाती है। विशेष रूप से एटलांटो-एक्सियल डिसलोकेशन ऐसी स्थिति है जिसमें गर्दन की ऊपरी हड्डियों का संतुलन बिगड़ जाता है और मरीज को गर्दन दर्द, चलने में दिक्कत, हाथ-पैरों में कमजोरी, चक्कर या गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्या हो सकती है।
पिछले कुछ वर्षों में इस सर्जरी की तकनीक में बड़ा बदलाव आया है। पहले कई मरीजों में सामने से बड़ी सर्जरी करनी पड़ती थी, लेकिन अब आधुनिक तकनीकों और बेहतर समझ के कारण अधिकतर मामलों में पीछे से ही हड्डियों को सही स्थिति में लाकर स्थिर किया जा सकता है। आज की आधुनिक सीवीजे सर्जरी केवल दबाव हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अस्थिरता को समझकर उसे सही करना ही इसका मुख्य उद्देश्य बन चुका है।
मैकेनिकल थ्रोम्बैकिनी से स्ट्रोक के मरीज को भी मिल जाता है सामान्य जीवन
एंडोवैस्कुलर मैनेजमेंट ऑफ स्ट्रोक: तकनीक और चुनौतियाँ’ विषय पर डॉ. दीपक कुमार सिंह, लखनऊ ने कहा कि मैकेनिकल थ्रोम्बैकिनी एक ऐसी विधि है जिसमें हम स्ट्रोक के ऐसे मरीजों के लिए खून के थक्के को एक तार डालकर स्टैंट के माध्यम से निकालते हैं, जहाँ खून के थक्के का साइज बड़ा है या वह खून की बड़ी नली में है। इस विधि को अपनाने का सबसे बड़ा लाभ यह मिलता है कि लकवे के मरीज को दवा देने की जो अवधि 4:30 घंटे की होती है, उसको 6 घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। अगर एमआरआई द्वारा स्पष्ट हो जाए कि मरीज के दिमाग का काफी हिस्सा जो खतरे में है, उसको थक्का हटाकर बचाया जा सकता है तो 24 घंटे तक भी इस प्रक्रिया को अपना कर मरीज को एक सामान्य जीवन प्रदान किया जा सकता है।
न्यूरो मॉनिटरिंग से बच्चों में रीढ़ की हड्डी करते हैं सीधी
पीडियाट्रिक स्कोलियोसिस यानी बच्चों में रीढ़ की हड्डी टेढ़ी हो जाने के बारे में डॉ. अनंत मेहरोत्रा, लखनऊ ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि बच्चों के लिए यह सर्जरी काफी जटिल सर्जरी मानी जाती है। इसमें हाथ-पाँव में कमजोरी आने और मल-मूत्र की तकलीफ बढ़ जाने का खतरा रहता है। ऐसे में न्यूरो मॉनिटरिंग जैसे खास उपकरण का ऑपरेशन के दौरान प्रयोग करके इन खतरों के ना के बराबर या बहुत कम कर दिया जाता है। ऑपरेशन की सफलता की दर बढ़ जाती है। बच्चों की सर्जरी अगर जल्दी करवा दी जाए तो उतनी जल्दी रीढ़ की हड्डी सीधी होने और बच्चों की ग्रोथ नॉर्मल होने का चांस बढ़ जाता है।
हाथ पैरों में कमजोरी या सुन्नपन हो तो हो जाएँ सतर्क
स्पाइनल कॉर्ड से संबंधित विभिन्न बीमारियों के बारे में अपने विचार साझा करते हुए डॉ. अमित श्रीवास्तव, नोएडा ने बताया कि स्पाइनल कॉर्ड में सूजन या डैमेज होने से मरीज के हाथ-पैरों में कमजोरी, असंतुलन, सुन्नपन और मल-मूत्र त्यागने में दिक्कत हो जाती है। ऐसी स्थिति में मरीज को तुरंत सतर्कता बरतते हुए चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए और उसके द्वारा बताई गई जाँचों के आधार पर उपचार करवाना चाहिए।
स्ट्रोक के मरीज को मिर्गी प्रतिरोधी दवा लंबे समय तक देना लाभप्रद नहीं: डॉ. अतुल अग्रवाल
केजी मेडिकल विश्वविद्यालय, लखनऊ के भूतपूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. अतुल अग्रवाल ने ‘स्ट्रोक एसोसिएटेड सीजर्स’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि स्ट्रोक के कारण बड़ी आयु में मिर्गी रोग हो जाता है। कुछ रोगियों में मिर्गी का दौरा स्ट्रोक होने के बाद ही शुरू हो जाता है जबकि अधिकतर रोगियों में यह कुछ सप्ताह या महीनों बाद होता है। इसलिए स्ट्रोक होते ही मिर्गी के दौरे से बचाव के लिए मिर्गी प्रतिरोधी दवा हफ्ते-10 दिन दी जानी चाहिए लेकिन इन दवाओं को लंबे समय तक देना लाभप्रद नहीं।
स्पाइन ट्यूमर का इलाज नवीन पद्धति से संभव: डॉ. सुमित सिन्हा
मैक्स हॉस्पिटल, दिल्ली के डॉ. सुमित सिन्हा ने स्पाइनल बोनी टयूमर्स पर विचार रखते हुए कहा कि अब स्पाइन ट्यूमर का इलाज भी नवीन पद्धति से संभव हो गया है।
ये चिकित्सक भी रहे शामिल
सेमिनार के विभिन्न सत्रों में एसआरएमएस, आइएमएस बरेली के डॉ. प्रवीण कुमार त्रिपाठी, लखनऊ से डॉ. अचल गुप्ता, फरीदाबाद से डॉ. मुकेश पांडे, मेदांता हॉस्पिटल के डॉ. गिरीश राजपाल, नोएडा के डॉ. नकुल पाहवा, डॉ. मृदुल शर्मा, फॉर्टिस हॉस्पिटल के डॉ. राहुल गुप्ता, डॉ. रमाकांत यादव, डॉ. अरुण सिंह, डॉ. कपिल सिंघल, डॉ. उर्वशी मीणा, यथार्थ हॉस्पिटल नोएडा के डॉ. मनीष गर्ग, डॉ. संजीव शर्मा, डॉ. तरुणेश शर्मा, डॉ. नीलेश गुप्ता, डॉ. राजीव बंसल, डॉ. प्रेमपाल भाटी, डॉ. गौरव धाकरे, डॉ. सजग गुप्ता, डॉ. विजयवीर सिंह, डॉ. नवनीत अग्रवाल, डॉ. एस के गुप्ता, डॉ. प्रशांत अग्रवाल, डॉ. अखिल प्रकाश शर्मा, डॉ. मुकुल पांडे, डॉ. नागेश वार्ष्णेय, डॉ. पदम चंद, डॉ. पुनीत गुप्ता, डॉ. प्रिंस अग्रवाल, डॉ. कुंज बिहारी और डॉ. आदित्य वार्ष्णेय भी प्रमुख रूप से सहभागी रहे।
डॉ. मयंक बंसल, डॉ. विजयवीर और डॉ. उद्भव बंसल ने संचालन किया। क्रिस्टल प्रोजेक्ट्स के केशव गुप्ता, मनोज और योगेश द्वारा सेमिनार का कुशल प्रबंधन किया गया।





